रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व मंच पर नई पहचान दिलाने वाली सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का रविवार को रायपुर एम्स में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं और उपचाररत थीं। उनके निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला एवं सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
तीजन बाई ने अपनी ओजस्वी आवाज, सशक्त अभिनय और अनूठी प्रस्तुति शैली से पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। महाभारत की कथाओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत करने की उनकी अद्भुत कला ने देश-विदेश के लाखों दर्शकों का मन मोह लिया। उन्होंने हजारों मंचों पर प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति का गौरव विश्वभर में बढ़ाया।
लोककला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री (1988), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995), पद्म भूषण (2003) और पद्म विभूषण (2019) सहित अनेक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें जापान के प्रतिष्ठित फुकुओका पुरस्कार तथा कई विश्वविद्यालयों की मानद डी.लिट. उपाधियों से भी अलंकृत किया गया।
दुर्ग जिले के पाटन विकासखंड के अटारी गांव में जन्मी तीजन बाई ने बेहद कठिन परिस्थितियों में अपनी कला यात्रा शुरू की। सामाजिक विरोध और पारिवारिक संघर्षों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपनी अद्वितीय प्रतिभा के बल पर पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनकी कला ने भारतीय लोक संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
मुख्यमंत्री सहित अनेक जनप्रतिनिधियों, कलाकारों और सांस्कृतिक संस्थाओं ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए इसे छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक विरासत के लिए अपूरणीय क्षति बताया। तीजन बाई का जाना भारतीय लोककला के एक स्वर्णिम युग का अवसान है, लेकिन उनकी अमर आवाज और अद्भुत कला सदैव आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
